झारखंड में बढ़ रहा ग्लूकोमा का खतरा, हर दिन मिल रहे नए मरीज; समय पर जांच ही बचाव का रास्ता

झारखंड में काला मोतियाबिंद यानी ग्लूकोमा के मामले धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं। यह एक ऐसा नेत्र रोग है जो बिना किसी स्पष्ट लक्षण के आंखों की रोशनी को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाता है। इसी वजह से डॉक्टर इसे आंखों का “साइलेंट चोर” भी कहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते इसकी पहचान न हो तो यह स्थायी दृष्टि हानि का कारण बन सकता है।

स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों और मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य की लगभग 10 से 12 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में ग्लूकोमा से प्रभावित हो सकती है। पलामू स्थित मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एमएमसीएच) के नेत्र रोग विभाग में आने वाले मरीजों के आंकड़े भी इसी ओर संकेत करते हैं। यहां रोजाना ओपीडी में आने वाले करीब 100 मरीजों में से औसतन 6 से 7 लोगों में ग्लूकोमा के लक्षण पाए जा रहे हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में मरीजों को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। जब तक लक्षण स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, तब तक आंखों की नसों को काफी नुकसान हो चुका होता है। इसलिए नियमित नेत्र जांच को बेहद जरूरी माना जाता है।

ग्लूकोमा के संभावित लक्षणों में आंख या सिर में दर्द, धुंधला दिखाई देना, रोशनी के आसपास इंद्रधनुष जैसे घेरे दिखना और साइड विजन कम होना शामिल है। कुछ मामलों में जी मिचलाना या उल्टी जैसी समस्या भी देखी जा सकती है। ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

विशेषज्ञ बताते हैं कि बढ़ती उम्र, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, परिवार में इस बीमारी का इतिहास और आंख में चोट लगना ग्लूकोमा के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इलाज के तौर पर दवाएं, लेजर या सर्जरी के जरिए बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन खोई हुई दृष्टि को वापस लाना संभव नहीं होता।

डॉक्टरों की सलाह है कि 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान और सही इलाज से ग्लूकोमा के कारण होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

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