देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लंबी लड़ाई अब अपने अंतिम चरण में पहुंचती नजर आ रही है। केंद्र सरकार द्वारा तय 31 मार्च 2026 की समयसीमा के बीच सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से हालात तेजी से बदल रहे हैं। कई बड़े नक्सली संगठनों की पकड़ कमजोर हुई है और बड़ी संख्या में उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया है या मुठभेड़ों में मारे गए हैं।
झारखंड में बड़ा बदलाव
झारखंड, जो कभी नक्सल गतिविधियों का प्रमुख गढ़ माना जाता था, वहां स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पहले जहां राज्य के करीब 16 जिले नक्सल प्रभावित थे, अब यह दायरा घटकर लगभग 4 जिलों तक सीमित रह गया है। सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त रणनीति, लगातार ऑपरेशन और विकास योजनाओं के विस्तार ने नक्सली नेटवर्क को कमजोर किया है।
हालांकि, खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। झारखंड में अब भी कुछ बड़े नक्सली कमांडर सक्रिय बताए जा रहे हैं। करीब एक-एक करोड़ रुपये के इनामी असिम मंडल और मिसिर बेसरा सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इन्हें पकड़ने या निष्क्रिय करने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं।
सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव
सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के चलते नक्सलियों की गतिविधियां सीमित होती जा रही हैं। कई इलाकों में उनका प्रभाव लगभग खत्म हो चुका है। इसके साथ ही, आम लोगों का भरोसा भी लौट रहा है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े विकास कार्यों ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है।
आंकड़ों में बदलाव
पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या में वृद्धि हुई है, वहीं कई बड़े कैडर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में खत्म किए गए हैं। इसके बावजूद एजेंसियां सतर्क हैं और अभियान जारी है।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, देश नक्सलवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत के करीब है। झारखंड समेत कई राज्यों में हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं, लेकिन असिम मंडल और मिसिर बेसरा जैसे शीर्ष नक्सली नेताओं की मौजूदगी अब भी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में इन पर कार्रवाई इस अभियान की दिशा तय करेगी।


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