जमशेदपुर: सपने देखने के लिए पैसे नहीं चाहिए, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए संघर्ष जरूर करना पड़ता है। भारतीय तीरंदाज अंकिता भकत की कहानी इसी संघर्ष की मिसाल है। जिस खिलाड़ी के परिवार के लिए कभी महंगा तीर-कमान खरीदना बड़ी चुनौती था, वही अंकिता अब एशियन गेम्स में भारत की ऐतिहासिक स्वर्ण पदक विजेता टीम का हिस्सा बन चुकी हैं।
2 अक्टूबर 2026 को जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन गेम्स में अंकिता भकत, कीर्ति शर्मा और कुमकुम मोहोड की भारतीय महिला रिकर्व टीम ने दक्षिण कोरिया को 5-3 से हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया। इस जीत के साथ भारत ने एशियन गेम्स की महिला रिकर्व टीम स्पर्धा में अपना पहला स्वर्ण पदक हासिल किया। इस मुकाबले की खासियत यह भी रही कि दक्षिण कोरिया ने 1998 से इस स्पर्धा में लगातार स्वर्ण जीता था।
जब धनुष खरीदना भी था बड़ी चुनौती
अंकिता का शुरुआती सफर आर्थिक कठिनाइयों से भरा रहा। उनके पिता शांतनु भकत कोलकाता में दूध बेचकर परिवार चलाते थे। बेटी की तीरंदाजी की ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के खर्च को पूरा करना आसान नहीं था। पिता ने बताया कि कई बार उन्हें अंकिता की ट्रेनिंग और स्थानीय व दूसरे शहरों की प्रतियोगिताओं के खर्च के लिए अपने भाइयों से पैसे उधार लेने पड़े।
अंकिता ने शुरुआती वर्षों में सीमित संसाधनों के बीच अभ्यास जारी रखा। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने लंबे समय तक लकड़ी और बांस के धनुष से अभ्यास किया और बाद में रिकर्व धनुष के साथ अपने खेल को आगे बढ़ाया। महंगे उपकरणों की कमी उनके रास्ते में आई, लेकिन उनके लक्ष्य के सामने यह मुश्किल ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी।
कोलकाता से जमशेदपुर तक पहुंचा सफर
अंकिता मूल रूप से कोलकाता से हैं, लेकिन उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को आकार देने में जमशेदपुर की टाटा आर्चरी अकादमी की बड़ी भूमिका रही। वर्ष 2014 में उनका चयन टाटा आर्चरी अकादमी में हुआ। यहां उन्हें बेहतर प्रशिक्षण, सुविधाएं और अनुभवी प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में अपनी तकनीक को निखारने का अवसर मिला।
यही वह दौर था जब सीमित संसाधनों से अभ्यास करने वाली युवा तीरंदाज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए खुद को तैयार करना शुरू किया।
लगातार बढ़ता गया अंतरराष्ट्रीय कद
अंकिता ने जूनियर स्तर से ही अपनी प्रतिभा का परिचय देना शुरू कर दिया था। 2017 में उन्होंने विश्व तीरंदाजी युवा चैंपियनशिप में मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता।
इसके बाद उन्होंने भारतीय टीम के साथ बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी जगह बनाई। 2022 एशियन गेम्स में महिला टीम के साथ कांस्य पदक जीतने के बाद 2024 पेरिस ओलंपिक में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। पेरिस में मिश्रित टीम स्पर्धा में भारतीय जोड़ी चौथे स्थान पर रही।
लेकिन अंकिता की सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धियों में से एक वर्ष 2025 में आई। ढाका में आयोजित एशियन आर्चरी चैंपियनशिप में उन्होंने दक्षिण कोरिया की पेरिस ओलंपिक रजत पदक विजेता नाम सुह्योन को 7-3 से हराकर महिला रिकर्व व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता। World Archery के अनुसार यह एशियन चैंपियनशिप में भारत का महिला रिकर्व व्यक्तिगत स्पर्धा में पहला स्वर्ण था।
एशियन गेम्स में रचा नया इतिहास
2 अक्टूबर 2026 का दिन अंकिता के करियर का एक और ऐतिहासिक पड़ाव बन गया। महिला रिकर्व टीम फाइनल में भारत का सामना मजबूत दक्षिण कोरियाई टीम से था।
अंकिता भकत, कीर्ति शर्मा और कुमकुम मोहोड ने दबाव के बीच संयम बनाए रखा और शानदार प्रदर्शन करते हुए दक्षिण कोरिया को 5-3 से मात दी। भारत ने पहली बार एशियन गेम्स की महिला रिकर्व टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता।
यह जीत केवल एक पदक नहीं थी। यह उस भारतीय तीरंदाजी टीम के लिए भी बड़ा क्षण था, जो इस स्पर्धा में इससे पहले एशियन गेम्स फाइनल तक नहीं पहुंच सकी थी। वहीं दक्षिण कोरिया की 1998 से चली आ रही लगातार सात स्वर्ण पदकों की श्रृंखला भी इस जीत के साथ समाप्त हुई।
पिता दूध बेचते रहे, बेटी ने देश के लिए जीता गोल्ड
अंकिता की सफलता की सबसे भावुक तस्वीर उनके पिता से जुड़ी है। जिस दिन बेटी एशियन गेम्स में इतिहास रच रही थीं, उस दिन भी उनके पिता शांतनु भकत कोलकाता में अपना दूध पहुंचाने का काम कर रहे थे। वे मोबाइल फोन पर बेटी का मुकाबला देखते हुए अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारी निभाते रहे।
अंकिता ने अपने पिता से कहा था कि उनकी पुरस्कार राशि परिवार के खर्च में मदद करेगी और उन्हें उम्र बढ़ने के बावजूद सुबह जल्दी उठकर दूध पहुंचाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन बेटी की ऐतिहासिक जीत के दिन भी पिता अपने काम पर कायम रहे।
संघर्ष से स्वर्ण तक का सफर
अंकिता भकत की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता अचानक नहीं आई। इसके पीछे वर्षों का अभ्यास, आर्थिक मुश्किलों के बीच परिवार का साथ, बेहतर प्रशिक्षण की तलाश और लगातार खुद को साबित करने की कोशिश रही।
एक समय जिस परिवार के लिए तीरंदाजी के उपकरण जुटाना चुनौती था, उसी परिवार की बेटी आज एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता है।
जमशेदपुर की टाटा आर्चरी अकादमी ने उनके सफर को नई दिशा दी और अंकिता ने अपने प्रदर्शन से इस अवसर को उपलब्धि में बदल दिया। उनका सफर यह बताता है कि संसाधनों की कमी किसी खिलाड़ी के सपनों को रोक सकती है, लेकिन हमेशा खत्म नहीं कर सकती।
अंकिता भकत का सफर अब सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं रह गया है। यह संघर्ष, परिवार के भरोसे और वर्षों की मेहनत से अंतरराष्ट्रीय इतिहास रचने की कहानी बन चुका है।


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